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कृष्ण जन्माष्टमी 2017


Category: Religious | Posted :Thursday, August 10, 2017

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कृष्ण जन्माष्टमी 2017

जन्माष्टमी 2017 - श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा

 
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु ने इस पृथ्वी पर कई अवतार लिऐ, भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। उस समय धर्म, यज्ञ, दया पर राक्षसों एवं दानवों द्वारा आघात पहुँचाया जा रहा था। पृथ्वी दुष्टों एवं पतितों के भार से पीड़ित थी। । उस भार को नष्ट करने के लिए भगवान विष्णु ने द्वापरयुग में प्रमुख अवतार ग्रहण किया जो कृष्णावतार के नाम से संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध हुआ।    
 
दा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः भवति भारत, अभि-उत्थानम् अधर्मस्य तदा आत्मानं सृजामि अहम् ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्-कृताम्, धर्म-संस्थापन-अर्थाय सम्भवामि युगे युगे ।
 
भावार्थः जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं ।
 
द्वापरयुग में भगवान विष्णु के आठवें अवतार  श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागृह हुआ था । जन्माष्टमी का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ देश भर में मनाया जाता है । जन्माष्टमी का त्यौहार विदेशों में इंटरनेशनल सोसायटी आफ कृष्णा कांशियसनेस इस्कान के मंदिरों में मनाया जाता है ।
 
 
श्री कृष्ण का जन्म
 
द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वासुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।  रास्ते में आकाशवाणी हुई हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी देवकी का आठवां बालक तेरा काल बनकर तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वासुदेव को मारने के लिए उतावला हो गया. तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे आपको सौंप दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?' कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया।
 
उसने वासुदेव और देवकी को पुनःकारागृह में डाल दिया। वासुदेव देवकी की एक-एक करके सातों संतानों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवीं संतान होने वाली थी कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। संयोगवश वासुदेव के मित्र नंदजी के घर भी संतान होने वाली थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान विष्णु प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में छोड़ आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना जी तुमको उस पार जाने के लिऐ रासता देगी।' उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े।  
 
भीषण अंधकार, तेज बारिश आसमानी बिजली की गरजना से वासुदेव जी थोड़ा भयभीत हो जाते हैं और जैसे-जैसे यमुना नदी को पार करते हैं यमुना जी ने भगवान श्री कृष्ण के चरण स्पर्श करने के लिए अपना जल बढऩा शुरू कर दिया है। ननहें कृष्ण के सूप से पांव बाहर निकालते ही यमुना नदी का जल घटने लगता है वासुदेव जी यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। कंस ने कारागृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और कंस से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।इसी ख़ुशी में हर साल जन्माष्टमी का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ भारत में मनाया जाता है । श्रीकृष्ण ने अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। कंस का वध भी भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
 
श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में जन्माष्टमी ज़ोरशोर से मनाई जाती है. इस दौरान ब्रज का कोना-कोना कृष्णमय हो उठता है और हर घर मंदिर बन जाता है, कृष्ण जन्मोत्सव को लेकर ब्रज में जबरदस्त उत्साह होता है। ब्रज भूमि मथुरा के तमाम मंदिरों में रोशनी के खास इंतजाम किऐ जातें हैं. पूरे मथुरा को इस खास मौके के लिए दुल्हन की तरह सजाया जाता है. मथुरा और वृन्दावन में जन्माष्टमी के मौके पर भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचतें हैं। देश विदेश से जनमाष्टमी के मौके पर लाखों की भारी संख्या में श्रद्धालु मथुरा और वृन्दावन जनमाष्टमी मनाने पहुँचतें हैं। इसके मद्दे नज़र प्रशासन के दूवारा् सुरक्षा के कड़े इंतजाम किऐ जातें है. मथुरा-वृन्दावन में चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात की जाती है. जनमाष्टमी के मौके पर देशभर के इस्कॉन मंदिरों को भी सजाया जाता है वृन्दावन के बांकेबिहारी मंदिर, इस्कॉन के कृष्ण-बलराम मंदिर, राधारमण मंदिर, राधावल्लभ मंदिर, प्रेम मंदिर आदि अनेक मंदिरों को विशेष रूप से जाता है..इसके अलावा मंदिरों में भगवान कृष्ण से जुड़ी लीलाएं और झांकियां भी निकाली जाती हैं
 
महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दिन दही हांडी उत्सव सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।  दही हांडी महोत्सव में लाखों युवा उत्साह से भाग लेते हैं। भगवान कृष्ण को माखन और  मिशरी बहुत पसंद है। इसीलिऐ अपने सखाओं के साथ माखन की चोरी किया करते थे। पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा  दही और माखन चुराया करते थे। जब  वे गोकुल के घरों में मटकियां फोड़ने का प्रयास करते थे, तो महिलाएं उन्हें रोकने के लिए पानी फेंकती थी। कान्हा के इसी रूप के कारण बड़े प्यार से उन्हें ‘माखनचोर’ कहा जाता है। हांडी फोड़ने वाले बच्चे को ‘गोविंदा’ कहा जाता है, जो ‘गोविंद’ का ही दूसरा नाम है। गोविंदा आला रे आला! ये वह शबद है जो जन्माष्टमी के दिन मुंबई की हर गली में सुनाई देता है। गोविंदा पथक  छोटी -बड़ी टोलियों में धूम मचाने ये गोविंदा घर-घर माखन चोरी करने पहुंचते हैं। दही-हांडी उत्सव में युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर गोविंदा दही-हाड़ी तोड़ते हैं। इस उत्सव को लेकर गोविंदाओं में जो उत्सुकता, जोश और खुशी दिखाई देता है  इस दौरान कई जगहों पर प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है।  जिसमें गोविंदाओं  टोली में से गोविंदा युवक ऊपर चढ़कर ऊंचाई पर लटकी हांडी, जिसमें दही और माखन होता है, उसे फोड़ता है। प्रतियोगिता जीतने वालों पर लाखों के इनाम की बौछार होती है। 
 
देश की राजधानी  दिल्ली में जनमाष्टमी की शोभा कुछ कम नही होती है। जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को फूल , लाईटिंग आदि से सजाया जाता है। मंदिर में कई प्रकार की झांकिया बनाई जाती है। झांकियों मे कृष्ण बाल लीलाओं की बड़ा ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया जाता है है। बिरला मंदिर के रूप में पहचाने जाने वाले लक्ष्मी नारायण मंदिर विशेष रूप से सजाया जाता है पुरानी दिल्ली के गौरी शंकर मंदिर को भी सजाया जाता है दिल्ली के एस्कॉन मंदिर में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा जाता है भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव जन्माष्टमी के अवसर पर देशभर के मंदिरों में ‘हरे कृष्णा, हरे रामा’ की गूंज सुनाई देती है और छोटे-छोटे बच्चे कृष्ण कन्हैया की पोशाक पहनकर मंदिरों में झांकी देखने आए लोगों के आकर्षण का केंद्र होतें है 
 
उत्तर भारत में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर गीतों और नृत्यों का आयोजन किया गया। रात में भगवान कृष्ण की प्रतिमा को नहलाया गया और नगाड़ों की धूमधाम के साथ उन्हें फूलों से सजे पालने में बिठा कर झुलाया गया। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा और वृंदावन में लाखों तीर्थयात्रियों ने मुख्य मंदिरों में पूजा अर्चना की गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की।
देशभर में अधिकतर लोगों जन्माष्टमी के अवसर पर व्रत रखतें हैं 
 
श्री कृष्ण की लीला आदि सुनी व सुनाई जाती है, श्रीकृष्ण को प्रिय रास आदि नृत्य किये जाते है।  उपवास करके बड़ी बेसब्री से उस क्षण का इंतजार करते है मध्य रात्रि रात के बारह बजते ही लोग खुशियाँ मनाते है।  एक दूसरे को कृष्ण जन्म की बधाइयाँ दी जाती हैं। लोग इस प्रकार गाते हुए आनंद में सराबोर हो जाते  हैं। 
 
 हाथी घोड़ा पालकी , जय कन्हैया लाल की
नन्द के आनंद भयो , जय कन्हैया लाल की
बृज में आनंद भयो , जय यशोदा लाल की
 
श्री कृष्ण के अवतरित होने के बाद भगवान का अभिषेक किया जाता है। मंदिरों और घरों में भक्ति भाव के पूजा की जाती है।  पूजा निशिता काल में किया जाना श्रेष्ठ माना जाता है। इस वर्ष निशिता का समय  ”11 :58  से  12 :44”  तक है। इस समय में पूजा कर लेनी चाहिए। पूजा के लिए श्रीकृष्ण को पंचामृत आदि से स्नान कराया जाता है , नए वस्त्र पहनाए जाते है। सुगंध, पुष्प, फल, मिष्ठान आदि अर्पित किये जाते है। श्रीकृष्ण को प्रिय माखन मिश्री, पंजीरी, फल आदि का भोग लगाया जाता है।
 


 

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