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गुरु पूर्णिमा 2017


Category: Religious | Posted :Friday, July 7, 2017

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गुरु पूर्णिमा 2017

भारत वर्ष ऋषि मुनियों, साधु , संतों और गुरुओं का देश है। गुरुओं से दीक्षा प्राप्त करना भारत की परंपरा रही है.गुरु के बिना गति यानि ईश्वर से मिलन असंभव है। भारत में हजारों साल तक गुरु-शिष्य परंपरा फलती-फूलती रही है।और आगे भी बढ़ती रही है।

 
हिंदू कैलेण्डर के अनुसार, गुरु पूर्णिमा को वेद व्यास का जन्म आषाढ़ की पूर्णिमा को हुआ था। ‘पूर्णिमा’ प्रकाश का प्रतीक है भारतीय दर्शन शास्त्र में सबसे महान गुरुओं में से एक कहा जाता है। वह गुरु-शिष्य शिक्षक-छात्र परंपरा का प्रतीक है। यह भी माना जाता है कि उन्होंने गुरु पूर्णिमा के दिन ब्रह्म सूत्रों को पूरा किया था गुरु शब्द का अर्थ है ‘अधंकार को दूर करने वाला’ । गुरु अज्ञान को दूर करके हमें ज्ञान का प्रकाश देता है। वह ज्ञान जो हमें बतलाता है कि हम कौन हैं  विश्व से कैसे जुड़ें और कैसे सच्ची सफलता प्राप्त करें। सबसे अधिक महत्वपूर्ण कि कैसे विश्व से ऊपर उठ कर अनश्वर परमानंद के धाम पहुंचे। गुरु पूर्णिमा के दिन हम फिर से अपने को मानव संपूर्णता के प्रति अपने आप को समर्पित करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह ज्ञान , शिक्षा , दीक्षा बांटने की अटूट कड़ी हैं।कहा जाता है कि प्राचीन काल में गुरुकुलों में जब शिष्य निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता तो गुरु पूर्णिमा के दिन ही वह श्रद्धा भाव से अपनी सामर्थ्यानुसार गुरु को दक्षिणा देकर उनका पूजन करता था। गुरु को समर्पित इस पर्व से शिक्षा लेते हुए हम सभी को अपने गुरुओं के प्रति ह्रदय से श्रद्धा रखनी चाहिए।
 
जब जब इस संसार मे भगवान को अवतार लेना पड़ा तब भगवान के अवतार ने भी इस परंपरा को निभाते हुए शिक्षा दीक्षा ग्रहण की। त्रैता युग मे राम जी और द्वापर युग मे कृष्ण जी ने  शिक्षा दीक्षा ग्रहण की। सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की किसी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रथम आवश्यकता समर्पण की होती है। समर्पण भाव से ही गुरु का प्रसाद शिष्य को मिलता है। शिष्य को अपना सर्वस्व सभी प्रकार के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों को दूर करने एवं उसे बैकुंठ धाम में पहुंचाने का दायित्व गुरु का होता है। शांति के लिए गुरु चरणों में आत्म समर्पण परम आवश्यक है। सदैव गुरुदेव का ध्यान करने से जीव नारायण स्वरूप हो जाता है। वह कहीं भी रहता हो, फिर भी मुक्त ही है। ब्रह्म निराकार है। इसलिए उसका ध्यान करना कठिन है। ऐसी स्थिति में सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करते रहना चाहिए। गुरुदेव नारायण स्वरूप हैं। इसलिए गुरु का नित्य ध्यान करते रहने से जीव नारायणमय हो जाता है। गुरु की भूमिका भारत में केवल आध्यात्म या धार्मिकता तक ही सीमित नहीं रही है, देश पर राजनीतिक विपदा आने पर गुरु ने देश को उचित सलाह देकर विपदा से उबारा भी है। अर्थात अनादिकाल से गुरु ने शिष्य का हर क्षेत्र में व्यापक एवं समग्रता से मार्गदर्शन किया है। अतः सद्गुरु की ऐसी महिमा के कारण उसका व्यक्तित्व माता-पिता से भी ऊपर है।   
 
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
 
TVAMEVA MAATAA CHA PITAA TVAMEVA, TVAMEVA BANDHUSHSHA SAKHAA TVAMEVA
 
ओह गुरु! आप मेरी मां और पिता हैं; आप मेरे भाई और साथी हैं
आप से ही मेरे पास ज्ञान और विद्या हैं आप हो तो मेरे पास सब कुछ है
 
एक तरह से, गुरु एक ईश्वरीय राजदूत हैं जो सिर्फ भगवान के आगे है ईश्वर से उम्मीद की जाती है कि हम परमानंदता, मानवता, अनुशासन, आध्यात्मिकता और हमारे अंदर बहुत अधिक गुण पैदा करें। गुरू से आशा है कि वे समान गुणों को प्राप्त करेंगे। लेकिन, एक तरह से, गुरु भगवान की तुलना में अधिक सच है। हम भगवान को नहीं देख सकते हैं, लेकिन गुरु हमेशा हमारे द्वारा हमें जीवन के सही रास्ते पर निर्देशित करने के लिए आते हैं।
 
आश्रमों से विश्वविद्यालयों में, शिक्षक-शिष्य रिश्ते ने एक लंबा रास्ता तय किया हो सकता है, लेकिन इस परंपरा में शायद ही कोई बदलाव आया है। एक शिक्षक छात्र को हमेशा को सही दिशा में निर्देशित करता है और सफलता हासिल करने में उनकी मदद करता है। और उनके सभी संत गुणों के साथ, गुरु हमेशा विद्यार्थियों की अपेक्षाओं को पूरा करता है। गुरु पूर्णिमा पर हमारे शिक्षकों या गुरुओं के प्रति आभार व्यक्त करने की  हमारी बारी है।
 
इस युग में भी गुरु की महत्ता में जरा भी कमी नहीं आयी है। एक बेहतर भविष्य के निर्माण हेतु आज भी गुरु का विशेष योगदान आवश्यक होता है। गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण दर्शित करने हेतु 'गुरु पूर्णिमा' का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन गुरु का पूजन करने से गुरु की दीक्षा का पूरा फल उनके शिष्यों को मिलता है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुओं का सम्मान किया जाता है। इस अवसर पर आश्रमों में पूजा-पाठ का विशेष आयोजन किया जाता है। हर गुरु की यही इच्छा होती है कि उसका शिष्य सबसे बेहतर निकले और नाम एवं यश कमाए पर गुरु कभी नाम एवं यश की कामना नही करता हर युग में गुरु सदैव पूजनीय रहे है और रहेंगे | संत कबीर कहते हैं-'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर॥'
 
अर्थात भगवान के रूठने पर तो गुरू की शरण रक्षा कर सकती है किंतु गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना सम्भव नहीं है।
 
गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।
 
Guru bin gyan na upajai, Guru bin mile na mosh,
Guru bin lakhai na satya ko, Guru bin mite na dosh
 
कबीर दास जी कहते हैं सांसरिक प्राणियों। बिना गुरू के ज्ञान का मिलना असम्भव है। तब तक मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता हुआ माया रूपी सांसारिक बन्धनों मे जकड़ा रहता है जब तक कि गुरू की कृपा प्राप्त नहीं होती। मोक्ष रूपी मार्ग दिखलाने वाले गुरू हैं। बिना गुरू के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरू की शरण में जाओ। गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे। गुरु का आशीर्वाद सबके लिए कल्याणकारी व ज्ञानवर्द्धक होता है, इसलिए इस दिन गुरु पूजन के उपरांत गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. सिख धर्म में इस पर्व का महत्व अधिक इस कारण है। क्योंकि सिख इतिहास में उनके दस गुरुओं का बेहद महत्व रहा है। गुरु ग्रन्थ साहिब मे तो गुरु बाणी को ही भगवान स्वरूप पूजा जाता  है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मन्दिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।
 
गुरु होता सबसे महान; जो देता है सबको ज्ञान; आओ इस गुरु पूर्णिमा पर करें अपने गुरु को प्रणाम। पूर्णिमा की शुभ कामनाय ।  
 


 

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