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जगन्नाथ रथयात्रा


Category: Religious | Posted :Thursday, June 29, 2017

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जगन्नाथ रथयात्रा

जगन्नाथ रथयात्रा 

 
भारत के करोड़ों हिंदुओं की आस्था का एक केंद्र भगवान जगन्नाथ की जगन्नाथ पुरी मंदिर है। भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा  सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण है।
 
जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी कहलाती है। जगन्नाथपुरी मंदिर को  चार धामों  में से एक धाम गिना जाता है।जगन्नाथजी का यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है यह मंदिर वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा हुआ है।
 
इस पंथ के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे और कई वर्षों तक पुरी में रहे भी थे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, इस मंदिर के मुख्य देव हैं। इनकी मूर्तियां, एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं जीवन में एक बार हर हिंदू इस मंदिर में पहुंच कर भगवान जगन्नाथ की कृपा पाने की आस रखता है।
 
प्रत्येक वर्ष ओडिशा के पूर्वी तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का उत्सव पारंपरिक रीति और धूमधाम से मनाया जाता है। रथ यात्रा महोत्सव में पहले दिन भगवान जगन्नाथ जी, बलराम जी एवम बहन सुभद्रा जी के रथ को आषाढ़ माह में द्वितीया की शाम तक जगन्नाथ मंदिर से खींचकर कुछ दूर पर स्थित गुडींचा मंदिर तक लाया जाता है। तत्पश्चात आषाढ़ माह की तृतीया को भगवान की मूर्ति को विधि पूर्वक रथ से उतारकर गुंडिचा मंदिर में स्थापित किया जाता है तथा अगले सात दिन तक जगन्नाथ जी, बलराम जी एवम बहन सुभद्रा के साथ इसी मंदिर में निवास करते है। तत्पश्चात आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन वापसी यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। यात्रा के दौरान पुनः गुंडीचा मंदिर से भगवान के रथ को विधिवत खींचकर जगन्नाथ मंदिर तक लाया जाता है। मंदिर पहुँचने के पश्चात प्रतिमाओं को पुनः मंदिर गृह में स्थापित कर दिया जाता है।   इस रथ को हाथों से खिंचना बेहद शुभ माना जाता है। वहीं अब जगन्नाथ जी की रथ यात्रा उत्सव देश भर के कई अन्य शहरों में मनाया जाने लगा है। 
 
 
कृष्ण, बलराम सुभद्रा के लकड़ी के रथ 
 
इस रथ यात्रा में भगवान श्री कृष्ण यानि जगन्नाथ जी, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ बनाया जाता है। लकड़ी के बने इन रथों में जगन्नाथजी के रथ को गरुड़ध्वज या कपिलध्वज, कहते हैं. इसका रंग लाल और पीला होता है जगन्नाथजी का रथ 16 पहियों वाला रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है. विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी हिफाजत करता हैं।  उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' कहते हैं।  बलराम जी के रथ को तालध्वज' कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है. जो 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं।
 
बहन सुभद्रा के रथ को देवदलन या पद्मध्वज कहते हैं। सुभद्रा का रथ। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथध्वज नदंबिक कहलाता हैं। हैरोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुडा कहते हैं।
 
रथ यात्रा का जुलूस देखने सड़क के दोनों ओर समूचे मार्ग पर लोगों की भारी भीड़ दिखाई देती है । सभी लोग रथ में स्थित भगवान् की मूर्ति के दर्शन करना और प्रसाद प्राप्त करना चाहते हैं । रथ के सामने आने पर अनेक लोग रस्सी पकड़कर कुछ देर रथ खींच कर अपने को धन्य मानते हैं । समूचे रास्तेभर रथ पर फूलों की वर्षा होती रहती है ।
 
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार श्री सुभद्रा जी ने द्वारका नगर देखना चाहा, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें रथ पर बैठाकर नगर घुमाया। इस घटना की याद में हर साल तीनों देवों यानि श्री कृष्ण, श्री बलराम और श्री सुभद्रा जी को रथ पर बैठाकर नगर दर्शन कराए जाते हैं।
 
कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर के पास रहते थे राजा, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए। राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।
 
महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, 'व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।' आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथयात्रा माता सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है।
 
 
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शुक्ल पक्ष आषाढ़ द्वितीय।
रथयात्रा त्योहार अद्वितीय।
चलो चलें रथयात्रा में।
पुरी में लोग बड़ी मात्रा में।
जगन्नाथ के मंदिर से।
भाई बहन वो सुन्दर से।
जगन्नाथ, बलभद्र हैं वो।
बहन सुभद्रा संग में जो।
मुख्य मंदिर के बाहर।
रथ खड़े हैं तीनों आकर।
कृष्ण के रथ में सोलह चक्के।
चौदह हैं बलभद्र के रथ में।
बहन के रथ में बारह चक्के॥
रथ को खींचों।
बैठो न थक के।
मौसी के घर जाएंगे।
मंदिर (गुंडिचा )हो आएंगे।
नौ दिन वहां बिताएंगे।
लौट के फिर आ जाएंगे।
बहुड़ा जात्रा नाम है इसका।
नाम सुनो अब कृष्ण के रथ का।
नंदिघोषा, कपिलध्वजा।
गरुड़ध्वजा भी कहते हैं।
लाल रंग और पीला रंग।
शोभा खूब बढ़ाते हैं।
तालध्वजा रथ सुन्दर सुन्दर।
भाई बलभद्र बैठे ऊपर।
नंगलध्वजा भी कहते हैं।
बच्चे, बूढ़े और सभी।
गीत उन्हीं के गाते हैं।
रंग-लाल, नीला और हरा।
ये त्योहार है खुशियों भरा।
देवदलन रथ आता है।
बहन सुभद्रा बैठी है।
कपड़ों के रंग काले-लाल।
दो सौ आठ किलो सोना।
तीनों पर ही सजता है।
खूब मनोहर सुन्दर झांकी।
कीमत इसकी कोई न आंकी।
दृश्य मन को भाता है।
एक झलक तो पा लूँ अब।
विचार यही बस आता है।
चलो चलें रथ यात्रा में।
पुरी में लोग बड़ी मात्रा में॥
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जगन्नाथ जी की विशेषता 
 
नबकलेबर का मुख्य आयोजन जगन्नाथ मंदिर में रखी मूर्तियों को बदलने से संबंधित है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की पुरानी मूर्तियों को बदला जाता है। महोत्सव का आयोजन तब होता है, जब हिंदू कैलेंडर में आषाढ़ के दो महीने होते हैं। ऐसा संयोग २०१५ में बना था जो १२ -१९ वर्षों में एक बार होता है। अब यह दुबारा संयोग २०३४ में होगा। 
 
जिस पेड़ से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाई जाती है, उसमें चार प्रमुख शाखाएं होनी चाहिए। ये शाखाएं नारायण की चार भुजाओं की प्रतीक होती हैं। वृक्ष के समीप ही जलाशय, श्मशान और चीटियों की बांबी होनी चाहिए। वृक्ष की कोई भी शाखा टूटी या कटी हुई नहीं हो। पेड़ तिराहे के पास हो या फिर तीन पहाड़ों से घिरा हुआ हो। उस वृक्ष पर कभी कोई लता नहीं उगी हो और उसके नजदीक ही वरुण, सहादा और बेल के वृक्ष हों (ये वृक्ष बहुत आम नहीं होते हैं)। वृक्ष के नजदीक शिव मंदिर होना भी जरूरी है।
भगवान की नई मूर्तियां खास किस्म की नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं। इसे स्थानीय भाषा में 'दारु ब्रह्मा' कहा जाता है।
 
भगवान व उनके भाई-बहनों के लिए विशेष तौर पर 12 फुट की माला तैयार की जाती है। इसे धन्व माला कहते हैं। यह माला 'पति महापात्र परिवार' को सौंप दी जाती है। यह परिवार पुरी से 50 किलोमीटर दूर काकतपुर तक मूर्तियों के लिए लकड़ी खोजने के लिए निकलता है। काकतपुर में मां मंगला का मंदिर है। यह दल पुरी के पूर्व राजा के महल में रुकता है। मूर्ति के लिए लकड़ी की खोजबीन बहुत ही जटिल है। जिस वृक्ष से भगवान जगन्नाथ मूर्ति बनाई जाती है, उसका रंग थोड़ा गहरा रहता है। उनके भाई-बहन का रंग गोरा है, इसलिए हल्के रंग का नीम वृक्ष ढूंढा जाता है। 
 
 
महाप्रसाद  
 
जगन्नाथ पूरी मंदिर में रथयात्रा का एक मुख्य आकर्षण महाप्रसाद होता है।
 
भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर जिस में ५०० रसोईये ३०० सहयोगियों के साथ मिल कर प्रसाद बनाया जाता है महाप्रसाद में मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से मिलता है। इसके आलावा मिश्रित खिचड़ी का प्रसाद भक्तो में बांटा जाता है। इस प्रकार जगन्नाथ जी की रथ यात्रा की कथा सम्पन्न होती हैं। 
 


 

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