श्री सत्यनारायण व्रत कथा

 
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 श्री सत्यनारायण व्रत कथा

 
एक अध्याय 
 
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार एक समय की बात है कि नैमिषारण्य तीर्थ पर शौनकादिक अट्ठासी हजार ऋषियों ने पुराणवेता महर्षि श्री सूत जी से पूछा कि हे महर्षि इस कलियुग में वेद बिना विद्या के प्राणियों का उद्धार कैसे होगा? क्या इसका कोई सरल उपाय है जिससे उन्हें मनोवांछित फल की प्राप्ति हो। इस पर महर्षि सूत जी ने कहा कि हे ऋषियो ऐसा ही प्रश्न एक बार नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था है? नारद ने कहा, "ओ, भगवान, पृथ्वी पर रहने वाले लोग अपने पिछले पापी कर्मों के परिणामस्वरूप कई तरह से पीड़ित हैं। कृपया कृपा करें और मुझे बताएं कि उन्हें कैसे मदद मिल सकती है।" भगवान विष्णु ने उत्तर दिया, "ओह, नारद, मानव जाति, सत्यनारायण पुजा नामक एक पूजा करके अपने सभी दुखों से मुक्त हो सकती है। धार्मिक पूजा के अनुसार जब यह पूजा की जाती है, तो इस जीवन में सुख, शांति और धन की शांति मिलेगी।"  तब स्वयं श्री हरि ने नारद जी को जो विधि बताई थी उसी को दोहरा रहा हूं। भगवान विष्णु ने नारद को बताया था कि इस संसार में लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुख-समृद्धि एवं अंत में परमधाम में जाने के लिये एक ही मार्ग वह है सत्यनारायण व्रत अर्थात सत्य का आचरण, सत्य के प्रति अपनी निष्ठा, सत्य के प्रति आग्रह। सत्य ईश्वर का ही रुप है सत्याचरण करना ही ईश्वर की आराधना करना है उसकी पूजा करना है। इसके महत्व को सपष्ट करते हुए ।" भगवान विष्णु ने उत्तर दिया: "यह पूजा किसी भी महीने पूर्ण-चंद्र दिवस पर की जा सकती है। अपने मित्रों और रिश्तेदारों को इकट्ठा करना चाहिए, भक्ति और प्रस्ताव फलों, घी, दूध, दही, मक्खन, गेहूं का आटा, चीनी और पूजा समाप्त होने के बाद, उन्हें सत्यनारायण कथा पढ़नी चाहिए और सभी को प्रसाद वितरित करना चाहिए। यदि पूजा इस प्रकार की जाती है, तो यह अपनी इच्छाओं को पूरा करेगी। विशेषकर कलियुग में, इस पूजा में संतोष होता है। " एक अध्याय का अंत | ओम श्री साईंनारायण नामा |
 
एक अध्याय का अंत |
 
ओम श्री साईंनारायण नामा | श्रीमन नारायण नारायण नारायण  भज मन  नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण
 
दूसरा अध्याय
 
महर्षि सूत जी  ने इकट्ठे  ऋषियों को संबोधित करना जारी रखा, "ओ ऋषि, मैं आपको बता दूंगा, जिन्होंने सभी ने सत्यनारायण पूजा को अतीत में देखा है। मै उनकी कथा कहता हूँ।सुनो काशी के खूबसूरत शहर में बहुत गरीब ब्राह्मण रहते थे भगवान विष्णु को उस ब्राह्मण की दीनता पर  दया आई और एक दिन भगवान स्वयं ब्राह्मण वेष धारण कर उस विप्र के पास पहुंचते हैं विप्र से उसकी व्यथा को सुनते हैं।
 
गरीब ब्राह्मण ने कहा, "महोदय, मैं बहुत गरीब हूं। भूख की पीड़ा को सहन करने में असमर्थ हूं, मैं भीख मांगता हूं। महोदय, यदि आप मुझे  इस दुख से बाहर निकाल सकतें हैं, तो कृपया  मुझे बताओ भगवान विष्णु ने सत्यनारायण व्याधि के विवरण को गरीब ब्राह्मण को समझाया  और गायब हो गए। गरीब ब्राह्मण ने तत्काल पूजा करने का संकल्प किया  वह सुबह जल्दी  उठ गया उस दिन  भीख मागने  पर उसे बहुत धन प्राप्त किया जिससे उसने फल और दूध, दही और शहद खरीदा और अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ सत्यनारायण भगवान पूजा की। इसके प्रभाव से उसकी दरिद्रता समाप्त हो गयी और वह धन धान्य से सम्पन्न हो गया और संतुष्ट जीवन जीया। हर महीने पूर्णिमा के दिन उसने पूजा की और अंत में मोक्ष प्राप्त किया।   महर्षि सूत जी  ने एकत्रित ऋषियों को इस कहानी को बताया, जो मूल रूप से भगवान विष्णु ने नारद मुनी को सुनाई थी। ऋषियों ने फिर महर्षि सूत जी  को संबोधित किया। कृपया हमें बताएं कि पूजा किसने की है एक दिन जब काशी नगर के गरीब ब्राह्मण को सत्यनारायण का व्रत करते देख बुढ़ा लकड़हारा पानी मांगने लगा। ब्राह्मण को पूजा करते देखकर, लकड़हारे ने पूछा किस भगवान की पूजा  हो रही है, कृपया आप मुझे बताएं,ब्राह्मण ने लकड़हारे को व्रत विधि की बताई. अगले दिन लकड़हारे को लकड़ी बेचने पर अघिक धन मिला, लकड़हारे ने सत्यनारायण भगवान पूजा की। धन धान्य से सम्पन्न हो वैकुंठ  धाम को प्राप्त किया ।
 
दूसरा अध्याय समाप्त
 
श्रीमन नारायण नारायण नारायण भज मन नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण
 
तीसरा अध्याय
 
महर्षि सूत जी बॊले ऋषियों, मै उनकी कथा  कहता हूँ। सुनो आगे चल कर  जिसने-जिसने यह व्रत किया उल्कामुखा नाम से एक बुद्धिमान राजा रहता था। उसने अपनी सारी इंद्रियों में महारत हासिल की और हमेशा सत्य बोलते थे। हर दिन मंदिर जाने के लिए और ब्राह्मणों को उपहार देते हैं. उसकी पत्नी शुद्ध और पवित्र महिला थी एक दिन राजा दंपति भद्र शीला नदी के तट पर सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे थे। एक वैश्य साधु जॊ व्यापार करता था राजा को नम्रता से संबोधित किया और पूछा "हे राजा, कृपया कर के आप मुझे बताएं भक्ति और एकाग्रता के साथ आप  किस देवता का व्रत पूजन कर रहे हो राजा ने उत्तर दिया, ओह, साधु, मेरे पास कोई संतान नहीं है मैं सर्वशक्तिमान भगवान सत्यानर्य की पूजा कर रहा हूं। इस को सुनकर साधु ने नम्रता से कहा  राजा, कृपया मुझे बताएं कि पूजा कैसे करें मैं व्रत का पालन करना चाहूंगा, क्योंकि मेरे पास भी कोई संतान नहीं है। "राजा ने सभी विवरणों को बताया। साधु घर लौट आया और बहुत खुशी से अपनी पत्नी से कहा कि उन्हें सत्यनारायण पूजा करनी चाहिए, जो कि संतान की इच्छा पूरी करते हैं। तब दिव्य अनुग्रह से, साधु की पत्नी लीलावती गर्भवती हुई थी और समय पर उन्हें एक कन्या पैदा हुई थी। उन्होंने कन्या का नाम कलiवती रखा। एक दिन, लीलावती ने अपने पति को याद दिलाया आपने सत्यनारायण जी की पूजा करने का वादा किया। साधु ने अपनी पत्नी से कहा कि वह अपनी बेटी की शादी के समय पूजा करेंगें। और अपने काम में व्यस्त हो गया। इस बीच, कलiवती विवाह योगय हो गई साधू ने दूतों को आज्ञा दी सुंदर कन्या के लिए वर ढू़ढ़कर लाओ साधू के दूतों को कांचनगर में एक वैश्य परिवार का सुखी और सुंदर लड़का मिला। साधु ने अपनी बेटी कलiवती का विवाह उस लड़के के साथ धूमधाम कर दिया। लेकिन साधू पूरी तरह से सत्यनारायण पूजा के बारे में भूल गए। कुछ समय बीता अपने काम में होशियार धनिक वैश्य अपने जामाता को साथ ले शीघ्र व्यापार के लिए चल पड़ा। वह समुद्र के पास सुंदर रत्नसार नगर में गया। वहाँ जाकर वह धनवान वैश्य अपने जामाता के साथ व्यापार करने लगा।  
 
इस सुंदर नगर का राजा चंद्रकेतु था। उस समय सत्यनारायण प्रभु ने प्रतिज्ञा से भ्रष्ट होने वाले वैश्य को कठिन शाप दिया। कि वैश्य बहुत कष्ट को प्राप्त करें। एक दिन राजा की संपत्ति चुराकर चोर उस स्थान पर आया जहां वैश्य और उसका दामाद ठहरे थे। राजा के दूतों को अपना पीछा करते देख चोर डरकर, धन वहीं छोड़ भाग गया। पीछे दौड़ते राजा के दूतों ने राजा की संपत्ति को वहां देखा और दोनों वैश्यों को बंदी बनाकर दूत राजा से बोले कि वे दो चोर लाए हैं। आप उनके लिए आज्ञा दें। राजा की आज्ञा से शीघ्र ही उन्हें बंदी बनाकर, बिना विचार किए जेल में डाल दिया। श्री सत्यनारायण की माया से वैश्यों की बात किसी ने नहीं सुनी। राजा चंद्रकेतु ने वैश्यों का सारा धन छीन लिया शापवश वैश्य की पत्नी भी बहुत दुखी हो गई। घर की संपत्ति चोर ले गए  वैश्य की स्त्री शरीर से रुग्ण, मन में चिंता लिए, भूख से दुखी, अन्न पाने के लिए घर-घर भटकने लगी। इसी प्रकार कलावती कन्या भी। एक दिन भूखी-प्यासी बेटी कलावती एक ब्राह्मण के घर गई, जहां उसने सत्य नारायण का व्रत पूजन होते देखा।  उसने वहां बैठकर कथा सुनी तथा प्रसाद लेकर रात्रि को अपने घर लौटी। घर जाने पर कलावती से उसकी माता ने प्रेमपूर्वक कहा कि बेटी रात में कहां रही। तेरे मन में है क्या? कलावती ने तत्काल मां से कहा कि माता मैंने ब्राह्मण के घर पर मनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत होते देखा है। मैं वहीं थी  कन्या के वचन सुनकर वैश्य की पत्नी तत्काल सत्यनारायण का व्रत करने को तैयार हो गई। साध्वी लीलावती ने अपने बंधु-बांधवों के साथ व्रत किया और मांगा कि मेरे पति और दामाद घर लौट आएं। लीलावती ने प्रार्थना की कि सत्य नारायण प्रभु उसके पति और दामाद के अपराध क्षमा करें। इस व्रत के प्रभाव स्वरूप, सत्य नारायण भगवान प्रसन्न हुए। राजा चंद्रकेतु को स्वप्न दिया कि वह सवेरे ही दो वैश्यों को मुक्त कर दें। छीना हुआ उनका धन लौटा दे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वे धन और पुत्रों सहित राजा के राज्य का नाश कर देंगे। इतना बताने के बाद श्री भगवान की स्वप्न वाणी मौन हो गई। प्रातःकाल राजा ने अपने स्वजनों एवं सभासदों को स्वप्न के संबंध में बताया और आदेश दिया कि बंदी वैश्यों को तत्काल छोड़ दिया जाए। राजा की आज्ञा पाकर राजा के सिपाही विनम्र भाव से दोनों वैश्य पुत्रों को बंधन के बिना राजा के समीप लाए। दोनों वैश्यों ने चंद्रकेतु को नमस्कार किया। पिछली दशा के डर से व्याकुल वैश्य पुत्र कुछ नहीं बोले। राजा ने दोनों वैश्यों को देख आदर से बोला।   
 
भाग्य ने आपको यह कष्ट दिया है। अब डरने की बात नहीं है। इसके बाद वैश्यों की बेड़ियां कटवा कर उनकी हजामत बनवाई। तब वस्त्र गहने आदि से उन्हें पुरस्कृत किया तथा प्रसन्न किया। अपने शब्दों से भी उनका संतोष  किया जो धन वैश्यों का छीना था वह दुगना कर लौटा दिया। राजा ने कहा हे साधु वैश्य तुम अब अपने घर जाओ। दोनों वैश्यों ने राजा को प्रणाम किया और कहा कि आपकी कृपा से हम अपने घर लौट जाएंगे। इस प्रकार दोनों वैश्य अपने घर के लिए चल पड़े। 
 
सत्यनारायण व्रत कथायां तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥  श्रीमन नारायण नारायण नारायण भज मन नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण
 
तीसरा अध्याय समाप्त !
 
चौथा अध्याय
 
सूतजी बोले- साधु नामक वैश्य मंगल स्मरण कर ब्राह्मणों को दान दक्षिणा दे, अपने घर की ओर चला।   
अभी कुछ दूर ही साधु चला था कि भगवान सत्यनारायण ने साधु वैश्य की मनोवृत्ति जानने के उद्देश्य से, दंडी का वेश धर, वैश्य से प्रश्न किया कि उसकी नाव में क्या है। संपत्ति में मस्त साधु ने हंसकर कहा कि दंडी स्वामी क्या तुम्हें मुद्रा (रुपए) चाहिए। मेरी नाव में तो लता-पत्र ही हैं। ऐसे निठुर वचन सुन श्री सत्यनारायण भगवान बोले कि तुम्हारा कहा सच हो।  इतना कह दंडी वैश्य कुछ दूर समुद्र के ही किनारे बैठ गए।  दंडी स्वामी के चले जाने पर साधु वैश्य ने देखा कि नाव हल्की और उठी हुई चल रही है। वह बहुत चकित हुआ। उसने नाव में लता-पत्र ही देखे तो मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। होश आने पर वह चिंता करने लगा। तब उसके दामाद ने कहा ऐसे शोक क्यों करते हो। यह दंडी स्वामी का शाप है। वे दंडी सर्वसमर्थ हैं इसमें संशय नहीं है। उनकी शरण में जाने से मनवांछित फल मिलेगा।  दामाद का कहना मान, वैश्य दंडी स्वामी के पास गया। दंडी स्वामी को प्रणाम कर सादर बोला। जो कुछ मैंने आपसे कहा था उसे क्षमा कर दें। ऐसा कह वह बार-बार नमन कर महाशोक से व्याकुल हो गया। वैश्य को रोते रोते देख दंडी स्वामी ने कहा मत रोओ। सुनो! तुम मेरी पूजा को भूलते हो। हे कुबुद्धि वाले! मेरी आज्ञा से तुम्हें बारबार दुःख हुआ है। वैश्य स्तुति करने लगा। साधु बोला- प्रभु आपकी माया से ब्रह्मादि भी मोहित हुए हैं। वे भी आपके अद्भुत रूप गुणों को नहीं जानते।
 
हे प्रभु! मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं माया से भ्रमित मूढ़ आपको कैसे पहचान सकता हूं। कृपया प्रसन्न होइए। मैं अपनी सामर्थ्य से आपका पूजन करूंगा। धन जैसा पहले था वैसा कर दें। मैं शरण में हूं। रक्षा कीजिए भक्तियुक्त वाक्यों को सुन जनार्दन संतुष्ट हुए। वैश्य को उसका मनचाहा वर देकर भगवान अंतर्धान हुए। तब वैश्य नाव पर आया और उसे धन से भरा देखा। सत्यनारायण की कृपा से मेरी मनोकामना पूर्ण हुई है, यह कहकर साधु वैश्य ने अपने सभी साथियों के साथ श्री सत्यनारायण की विधिपूर्वक पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा प्राप्त कर साधु बहुत प्रसन्न हुआ। नाव चलने योग्य बना अपने देश की ओर चल पड़ा।  अपने गृह नगर के निकट वैश्य अपने दामाद से बोला- देखो वह मेरी रत्नपुरी है। धन के रक्षक दूत को नगर भेजा। दूत नगर में साधु वैश्य की स्त्री से हाथ जोड़कर उचित वाक्य बोला। वैश्य दामाद के साथ तथा बहुत-सा धन ले संगी-साथी के साथ, नगर के निकट आ गए हैं। दूत के वचन सुन सती स्त्री बहुत प्रसन्न हुई। भगवान सत्यनारायण की पूजा पूर्ण कर अपनी बेटी से बोला। मैं साधु के दर्शन के चलती हूं। तुम जल्दी आओ अपनी मां के वचन सुन पुत्री ने भी व्रत समाप्त माना।  प्रसाद लेना छोड़ अपने पति के दर्शनार्थ चल पड़ी। भगवान सत्यनारायण इससे रुष्ट हो गए और उसके पति तथा धन से लदी नाव को जल में डुबा दिया ॥25॥ कलावती ने वहां अपने पति को नहीं देखा। उसे बड़ा दुख हुआ और वह रोती हुई भूमि पर गिर गई। नाव को डूबती हुई देखा। कन्या के रुदन से डरा हुआ साधु वैश्य बोला- क्या आश्चर्य हो गया। नाव के मल्लाह भी चिंता करने लगे। अब तो लीलावती भी अपनी बेटी को दुखी देख व्याकुल हो पति से बोली।  इस समय नाव सहित दामाद कैसे अदृश्य हो गए हैं। न जाने किस देवता ने नाव हर ली है। प्रभु सत्यनारायण की महिमा कौन जान सकता है। इतना कह वह स्वजनों के साथ रोने लगी। फिर अपनी बेटी को गोद में ले विलाप करने करने लगी। वहां बेटी कलावती अपने पति के नहीं रहने पर दुखी हो रही थी। वैश्य कन्या ने पति की खड़ाऊ लेकर मर जाने का विचार किया। स्त्री सहित साधु वैश्य ने अपनी बेटी का यह रूप देखा। धर्मात्मा साधु वैश्य दुख से बहुत व्याकुल हो चिंता करने लगा। उसने कहा कि यह हरण श्री सत्यदेव ने किया है। सत्य की माया से मोहित हूं। सबको अपने पास बुलाकर उसने कहा कि मैं सविस्तार सत्यदेव का पूजन करूंगा। दिन प्रतिपालन करने वाले भगवान सत्यनारायण बारंबार प्रणाम   करने पर प्रसन्न हो गए। भक्तवत्सल ने कृपा कर यह वचन कहे। तुम्हारी बेटी प्रसाद छोड़ पति को देखने आई। इसी के कारण उसका पति अदृश्य हो गया। यदि यह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करे और फिर आए। तो हे साधु! इसे इसका पति मिलेगा इसमें संशय नहीं है। साधु की बेटी ने भी यह आकाशवाणी सुनी।  तत्काल वह घर गई और प्रसाद प्राप्त किया। फिर लौटी तो अपने सजन पति को वहां देखा।   तब उसने अपने पिता से कहा कि अब घर चलना चाहिए देर क्यों कर रखी है। अपनी बेटी के वचन सुन साधु वैश्य प्रसन्न हुआ और भगवान सत्यनारायण का विधि-विधान से पूजन किया। अपने बंधु-बांधवों एवं जामाता को ले अपने घर गया। पूर्णिमा और संक्रांति को सत्यनारायण का पूजन करता रहा। अपने जीवनकाल में सुख भोगता रहा और अंत में श्री सत्यनारायण के वैकुंठ लोक गया, जो अवैष्णवों को प्राप्य नहीं है और जहां मायाकृत (सत्य, रज, तम ) तीन गुणों का प्रभाव नहीं है।  
 
सत्यनारायण व्रत कथायां चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥ श्रीमन नारायण नारायण नारायण भज मन नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण
 
चौथा अध्याय समाप्त !
 
पंचम अध्याय  
 
श्री सूतजी ने आगे कहा- 'हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ। उसे भी सुनो। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यदेव का प्रसाद त्याग कर बहुत दुःख पाया। एक समय राजा वन में वन्य वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति भाव से बंधु-बांधवों सहित श्री सत्यनारायण का पूजन करते देखा, परंतु राजा देखकर भी अभिमानवश न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया। जब ग्वालों ने भगवान का प्रसाद उनके सामने रखा तो वह प्रसाद त्याग कर अपने नगर को चला गया।
 
नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने ही किया है। तब वह उसी स्थान पर वापस आया और ग्वालों के समीप गया और विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यनारायण की कृपा से सब-कुछ पहले जैसा ही हो गया और दीर्घकाल तक सुख भोगकर मरने पर स्वर्गलोक को चला गया।  जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी और बंदी बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। संतानहीन को संतान प्राप्त होती है तथा सब  मनोरथ पूर्ण होकर अंत में वह बैकुंठ धाम को जाता है।  जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिए। शतानंद नामक ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति कर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम के महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रंगनाथ का पूजन कर बैकुंठ को प्राप्त हुए।
 
साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपनी देह को आरे से चीरकर दान करके मोक्ष को प्राप्त हुआ। महाराज तुंगध्वज स्वयंभू मनु हुए उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कर मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भील अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा हुआ, जिसने भगवान राम के चरणों की सेवा कर मोक्ष प्राप्त किया।  
 
पंचम अध्याय समाप्तः॥ 
 
Sriman narayan narayan narayan,Bhajman narayan narayan narayan
Satya narayan narayan narayan, Sriman narayan narayan narayan
 
 
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जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

रतन जड़ित सिंहासन, अदभुत छवि राजे
नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

प्रकट भए कलिकारण, द्विज को दरस दियो
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

दुर्बल भील कठोरो, जिन पर कृपा करी
चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरि
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही 
सो फल भाग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्ही
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

भव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो
श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सरो 
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी
मनवांछित फल दीन्हो, दीन दयालु हरि
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

चढत प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा 
धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा 
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा

सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे 
ऋषि-सिद्ध सुख-संपत्ति सहज रूप पावे 
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा
 
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